।। श्रीहरिः ।।




आजकी शुभ तिथि–
कार्तिक शुक्ल तृतीया, वि.सं.-२०७४, रविवार
कल्याणके तीन सुगम मार्ग



(गत ब्लॉगसे आगेका)

कर्मयोगी अपने कर्तव्यका पालन करते हुए दूसरेके अधिकारकी रक्षा करता है । जो दूसरेका अधिकार होता है, वही हमारा कर्तव्य होता है । जैसे, माता-पिताकी सेवा करना पुत्रका कर्तव्य है और माता-पिताका अधिकार है । अपना अधिकार चाहनेवाला मनुष्य अपने कर्तव्यका पालन नहीं कर सकता । इसलिये कर्मयोगका साधक अपने अधिकारका त्याग करता है । अपने अधिकारका त्याग करनेसे नया राग पैदा नहीं होता और दूसरेके अधिकारकी रक्षा करनेसे पुराना राग मिट जाता है और साधक सुगमतापूर्वक राग-रहित हो जाता है ।

मनुष्य अपने अधिकारका त्याग तथा दूसरेके अधिकारकी रक्षा करनेमें तो स्वतन्त्र है, पर अधिकार प्राप्त करनेमें स्वतन्त्र नहीं है । अधिकार पानेकी लालसा मनुष्यको कर्तव्यच्युत करके उसको काम, क्रोध, लोभ आदि दोषोंसे युक्त कर देती है, जिससे उसका पतन हो जाता है । इसलिये कर्मयोगका साधक दूसरेके अधिकारकी रक्षा करता है ।

जब अपने कहलानेवाले शरीरपर ही हमारा अधिकार नहीं चलता, तो फिर शरीर जिसका अंश है, उस संसारपर हमारा अधिकार कैसे चल सकता है ? परन्तु हमारेपर शरीर और संसारका अधिकार अवश्य है । शरीरका अधिकार यह है कि हम उसको आलसी, अकर्मण्य, प्रमादी, असंयमी न बनने दें और संसारका अधिकार यह है कि हम शरीरके द्वारा संसारकी सेवा करें, किसीका भी अहित न करें, सबको सुख पहुँचायें ।

समाजमें ज्यों-ज्यों अधिकार पानेकी लालसा बढ़ती जाती हैं, त्यों-ही-त्यों लोग अपने कर्तव्यसे हटते जाते हैं, जिससे समाजमें संघर्ष पैदा हो जाता है । अधिकार पानेकी इच्छासे गुलामी आ जाती है । अतः अपने अधिकारका त्याग करना प्रत्येक साधकके लिये आवश्यक है । अपने अधिकारका त्याग करनेसे उदारता और असंगता‒दोनों आ जाती हैं । उदारता आनेसे कर्मयोगकी तथा असंगता आनेसे ज्ञानयोगकी सिद्धि हो जाती है ।

वास्तवमें अधिकार देनेकी वस्तु है, लेनेकी वस्तु नहीं । कोई जबर्दस्ती अधिकार लेना भी चाहे तो नहीं ले सकता । बलवान्‌-से-बलवान्‌ व्यक्ति भी दूसरोंका विनाश तो कर सकता है, पर दूसरोंका अपने प्रति आदर, प्रेम, श्रद्धा, विश्वास उत्पन्न नहीं करा सकता । यद्यपि मनुष्यका मूल्य संसारसे अधिक है, तथापि अधिकार पानेकी लालसासे वह अपना मूल्य गिरा देता है । अधिकार पानेकी लालसाके मूलमें नाशवान्‌ सुखकी लालसा है । जब साधक सुखकी आसक्तिको मिटा देता है, तब अधिकार पानेकी लालसा मिट जाती है और साधकका कर्मयोग सिद्ध हो जाता है ।

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘कल्याणके तीन सुगम मार्ग’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।




आजकी शुभ तिथि–
कार्तिक शुक्ल द्वितीया, वि.सं.-२०७४, शनिवार
भाईदूज
कल्याणके तीन सुगम मार्ग



(गत ब्लॉगसे आगेका)

मनुष्य किसीका बुरा चाहता है तो उसका बुरा तो होता नहीं, पर अपना बुरा अवश्य हो जाता है । दूसरेका बुरा चाहनेवालेकी हानि ज्यादा होती है; क्योंकि बुरा चाहनेसे उसके भावमें बुराई आ जाती है । कर्मकी अपेक्षा भाव सूक्ष्म और व्यापक होता है । अतः दूसरेका बुरा चाहनेमें अपना ही बुरा निहित है । यह नियम है कि हम दूसरेके प्रति जो करेंगे, वही परिणाममें अपने प्रति हो जायगा । इसलिये साधकको किसीका भी बुरा चाहनेका, बुरा समझनेका अथवा बुरा करनेका अधिकार नहीं है । उसको समानरूपसे सबके हितका भाव रखते हुए सबकी सेवा करनेका ही अधिकार है । सेवा करनेसे ही वह कर्मयोगका अधिकारी होता है । दूसरेका बुरा करनेवाला, बुरा समझनेवाला अथवा बुरा करनेवाला दूसरेपर शासन तो कर सकता है, पर सेवा नहीं कर सकता । शासक सेवक नहीं हो सकता और सेवक शासक नहीं हो सकता । समाजकी उन्नति सेवकके द्वारा होती है, शासकके द्वारा नहीं ।

भलाई करना तो परिश्रम-साध्य है, पर बुराई न करनेमें कोई परिश्रम नहीं होता तथा कोई खर्चा भी नहीं होता । इसलिये बुराईका त्याग करनेमें सब स्वतन्त्र तथा समर्थ हैं । यहाँ एक शंका होती है कि जब दूसरा व्यक्ति हमारे साथ बुराई कर रहा है तो फिर हम कैसे उसको बुरा न समझें, उसका बुरा न चाहें ? इसका समाधान यह है कि दूसरा हमारा बुरा करता है तो यह बुराई उसमें आयी हुई है, स्वाभाविक नहीं है । स्वरूपसे तो वह सर्वथा बुराई-रहित है । दूसरी बात, हमारा बुरा होनेसे हमारे पुराने पाप कटते हैं और हम शुद्ध होते हैं । तीसरी बात, गहरा विचार करनेसे पता लगता है कि दूसरा हमारे साथ बुराई तभी करता है, जब हम निर्बल होते हैं । हम निर्बल तब होते हैं, जब प्राणोंमें मोह होनेके कारण हम मृत्युसे डरते हैं और इस कारण अपने प्रति होनेवाली बुराईको हम सहते हैं । अगर हमारेमें प्राणोंका मोह न रहे, जीनेकी इच्छा और मरनेका भय न रहे तो कोई बलवान्‌ व्यक्ति हमारेपर अत्याचार नहीं कर सकेगा । यह सिद्धान्त है कि भौतिक बल कभी भी आध्यात्मिक बलपर विजय प्राप्त नहीं कर सकता । नाशवान्‌ वस्तु अविनाशीपर विजय कैसे कर सकती है ? अन्धकार प्रकाशपर विजय कैसे कर सकता है ? जिसका मिलने और बिछुड़नेवाले शरीरमें ‘मैं’-पन और ‘मेरा’-पन नहीं है, उसको कोई अपने अधीन नहीं कर सकता । उसपर कोई विजय नहीं कर सकता । विचार करना चाहिये कि जब शरीरका नाश होनेपर भी हमारी सत्ताका नाश नहीं होता[*], तो फिर शरीरको रखनेकी इच्छा और मृत्युका भय करनेसे क्या लाभ ? इसलिये साधकको अपना कर्तव्य जितना प्रिय होता है, उतने अपने प्राण भी प्रिय नहीं होते । अपने कर्त्तव्यकी रक्षाके लिये वह प्राणोंका भी त्याग कर देता है । ऐसे साधकको कोई बलवान्‌-से-बलवान्‌ व्यक्ति भी अपने अधीन करके कर्तव्यच्युत नहीं कर सकता ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘कल्याणके तीन सुगम मार्ग’ पुस्तकसे




[*] न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
       अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥
                                                                       (गीता २/२०)

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।। श्रीहरिः ।।




आजकी शुभ तिथि–
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा, वि.सं.-२०७४, शुक्रवार
अन्नकूट, गोवर्धनपूजा
कल्याणके तीन सुगम मार्ग



(गत ब्लॉगसे आगेका)

कर्मयोगका मार्ग

जब साधक अपने जीवनमें बुराईका त्याग कर देता है, तब कर्मयोगकी सिद्धि हो जाती है । बुराईका त्याग तीन बातोंसे होता है‒

 (१) किसीका भी बुरा न करना
 (२) किसीको भी बुरा न समझना और
 (३) किसीका भी बुरा न चाहना ।

बुराईके त्याग किये बिना मनुष्य कर्तव्य-परायण नहीं हो सकता ।

मनुष्य किसीका भी बुरा करता है, जब वह स्वार्थवश खुद बुरा बनता है । खुदको बुरा बनाये बिना मनुष्य किसीका भी बुरा नहीं कर सकता । कारण कि जैसे कर्ता होता है, वैसे ही कर्म होते हैं‒यह सिद्धान्त है । कर्म कर्ताके अधीन होते हैं । इसलिये सबसे पहले मनुष्यको चाहिये कि वह अपनेको साधक स्वीकार करे । जब कर्ता साधक होगा तो फिर उसके द्वारा साधकके विपरीत कर्म कैसे होंगे ? साधकके द्वारा किसीका बुरा नहीं होता । इतना नहीं, वह अपने प्रति बुराई करनेवालेका भी बुरा नहीं करता, प्रत्युत उसपर दया करता है । बुराईके बदले बुराई करनेसे तो बुराईकी वृद्धि ही होगी, बुराईकी निवृत्ति कैसे होगी ? बुराईके बदले बुराई न करनेसे तथा भलाई करनेसे ही बुराईकी निवृत्ति हो सकती है ।

कोई भी मनुष्य सर्वथा बुरा नहीं होता और सभीके लिये बुरा नहीं होता । मनुष्य सर्वथा भला तो हो सकता है, पर सर्वथा बुरा नहीं हो सकता । कारण कि बुराई कृत्रिम, आगन्तुक, अस्वाभाविक है । बुराईकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है । इसलिये बुराईको न दुहरानेसे बुराई सर्वथा मिट जाती है । बुराईको न दुहराना साधकका खास काम है । बुराईको न दुहरानेसे मनुष्य बुरा नहीं रहता, प्रत्युत भला हो जाता है ।

मनुष्यको किसीको भी बुरा समझनेका अधिकार नहीं है । दूसरेमें जो बुराई दीखती है, वह उसके स्वरूपमें नहीं है, प्रत्युत आगन्तुक है । मनुष्यके स्वभावमें यह दोष रहता है कि वह अपनी बुराईको तो क्षमा कर देता है, पर दूसरेकी बुराईको देखकर उसके प्रति न्याय करता है । साधकका कर्तव्य है कि वह अपने प्रति न्याय करे और दूसरेके प्रति क्षमा करे । भगवान्‌का अंश होनेके नाते मनुष्यमात्र स्वरूपसे निर्दोष है‒

ईस्वर  अंस  जीव  अबिनासी । चेतन अमल सहज सुख रासी ॥
                                                                  (मानस, उत्तर ११७/२)

     इसलिये किसी भी मनुष्यमें बुराईकी स्थापना नहीं करनी चाहिये । आगन्तुक बुराईके आधारपर किसीको बुरा समझना अनुचित है । दूसरा चाहे बुरा हो या न हो, पर उसको बुरा समझनेसे अपनेमें बुराई आ ही जायगी । दूसरेको बुरा समझेंगे तो अपने भीतर बुरे संकल्प पैदा होंगे, क्रोध पैदा होगा, वैरभाव पैदा होगा, विषमता पैदा होगी, पक्षपात पैदा होगा । इनके पैदा होनेसे कर्म भी अशुद्ध होने लगेंगे । अतः बुराईकी स्थापना न तो अपनेमें करनी चाहिये और न दूसरोंमें ही करनी चाहिये । बुराईकी स्थापना करनेसे न अपना हित होता है, न दूसरेका । किसीको बुरा समझना अथवा किसीका बुरा चाहना बुराई करनेसे भी बड़ा दोष है ।   

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘कल्याणके तीन सुगम मार्ग’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।




आजकी शुभ तिथि–
कार्तिक अमावस्या, वि.सं.-२०७४, गुरुवार
दीपावली
कल्याणके तीन सुगम मार्ग



(गत ब्लॉगसे आगेका)

 जप, तप, व्रत, तीर्थ, स्वाध्याय आदि क्रियासाध्य साधनोंसे कामनाका नाश नहीं होता । कारण कि कोई भी क्रिया (अभ्यास) करनेके लिये शरीरकी सहायता लेनी पड़ती है और शरीरके सम्बन्धसे ही कामनाओंकी उत्पत्ति होती है । अतः कामनाका नाश किसी क्रियासे नहीं होता, प्रत्युत सर्वथा क्रियारहित होनेसे तथा विवेकको महत्त्व देनेसे होता है । क्रियारहित होते ही शरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद होकर स्वरूपमें स्थिति स्वतः होती है । स्वरूपमें निर्ममता और निष्कामता स्वतःसिद्ध हैं । अतः शरीर-संसारके सम्बन्धसे होनेवाले ममता, कामना आदि दोषोंका नाश करनेके लिये क्रिया और पदार्थसे सम्बन्ध-विच्छेद करना आवश्यक है ।

जब साधक निर्मम और निष्काम हो जाता है, तब उसकी अहंता मिट जाती है । अहंता मिटनेपर फिर उसके लिये कुछ भी करना शेष नहीं रहता‒ ‘निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति’ (गीता २/७१) । जबतक साधक अपने लिये कुछ भी करता है, तबतक उसका सम्बन्ध क्रिया और पदार्थसे बना रहता है । जबतक क्रिया और पदार्थसे सम्बन्ध है, तबतक पराधीनता है । क्रिया और पदार्थ संसारकी सेवाके लिये तो उपयोगी हैं, पर अपने लिये इनका त्याग ही उपयोगी है । सेवा और त्याग कृत्रिम नहीं हैं, प्रत्युत स्वतः-स्वाभाविक हैं । इसलिये मैं सेवा करता हूँ अथवा मैं त्याग करता हूँ‒ऐसा अभिमान करना भूल है । जब संसारमें मेरी कोई वस्तु है ही नहीं तो त्याग क्या हुआ ? और जिसकी वस्तु थी, वह उसको दे दी तो सेवा क्या हुई ? यह सिद्धान्त है कि जो कभी भी अलग होगा, वह अभी भी अलग है । इसलिये नित्यनिवृत्तिकी ही निवृत्ति होती है और नित्यप्राप्तकी ही प्राप्ति होती है‒इस सत्यको स्वीकार करना साधकके लिये आवश्यक है ।

जबतक साधकमें अपने लिये कुछ भी करनेका भाव रहता है, तबतक उसका सम्बन्ध कर्म-सामग्रीके साथ अर्थात्‌ शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिके साथ बना रहता है । जबतक शरीरके साथ सम्बन्ध रहता है, तबतक मनुष्यमें न तो निःस्वार्थभाव आता है और न स्वाधीनता आती है अर्थात्‌ वह न तो कर्मयोगका अधिकारी होता है, न ज्ञानयोगका । जो मनुष्य स्वार्थभाव और पराधीनतासे रहित नहीं हो सका, वह भगवान्‌का प्रेमी भी कैसे हो सकता है ? इसलिये ‘क्रिया’ के आश्रयका त्याग करके विश्राम (कुछ न करने)-को अपनाना और ‘पदार्थ’ के आश्रयका त्याग करके स्वाश्रय अथवा भगवदाश्रयको अपनाना प्रत्येक साधकके लिये बहुत आवश्यक है ।

विवेककी जागृति किसी क्रियासे नहीं होती, प्रत्युत क्रियारहित होनेसे होती है । विवेकको महत्त्व देनेसे विवेक ही तत्त्वज्ञानमें परिणत हो जाता है । तात्पर्य है कि तत्त्वज्ञान किसी क्रिया या पदार्थके द्वारा नहीं होता, प्रत्युत अपने ही द्वारा होता है । जिसकी प्राप्ति अपने द्वारा होती है, उसके लिये किसी अभ्यासकी आवश्यकता नहीं होती । अभ्याससे तो उलटे वह दूर होता है ! मनुष्य जिन करणों (मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ)‒से संसारको देखता है, उनसे अपने-आपको (करणरहित सत्तामात्र स्वरूपको) नहीं देख सकता‒‘यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति’ (गीता ६/२०) । तात्पर्य है कि अपने-आपको किसी करणके द्वारा नहीं देखा जा सकता, प्रत्युत करणोंके त्यागसे ही देखा जा सकता है ।    

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘कल्याणके तीन सुगम मार्ग’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।




आजकी शुभ तिथि–
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी, वि.सं.-२०७४, बुधवार
श्रीहनुमज्जयन्ति
कल्याणके तीन सुगम मार्ग



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 मिली हुई और बिछुड़नेवाली वस्तुओंमें ‘मैं’-पन और ‘मेरा’-पन होनेसे ही कामनाओंकी उत्पति होती है । सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति आजतक किसीकी नहीं हुई, न होगी और न हो ही सकती है । जिन कामनाओंकी पूर्ति होती है, वे भी परिणाममें दुःख ही देती हैं । कारण कि एक कामनाकी पूर्ति होनेपर दूसरी अनेक कामनाएँ पैदा हो जाती हैं, जिससे कामना आपूर्तिका दुःख ज्यों-का-त्यों बना रहता है । मनुष्य समझता है कि कामनाकी पूर्ति होनेपर मैं स्वतन्त्र हो गया, पर वास्तवमें वह काम्य पदार्थके पराधीन हो जाता है । परन्तु प्रमादके कारण वह पराधीनतामें भी सुखका अनुभव करता है । मनुष्यको इस पराधीनतासे छुड़ानेके लिये भगवान्‌के मंगलमय विधानसे दुःख आता है । परन्तु मनुष्य दुःखसे दुःखी होकर भगवान्‌के मंगलमय विधानकी भी अवहेलना कर देता है । अगर वह दुःखसे दुःखी न होकर दुःखके कारणकी खोज करे और सम्पूर्ण दुःखोंके कारण ‘कामना’ को मिटा दे तो वह सदाके लिये सुखी हो जायगा ।

प्रत्येक साधकके लिये निष्काम होना बहुत आवश्यक है; क्योंकि निष्काम हुए बिना साधक अपने कर्तव्यका पालन नहीं कर सकता । इतना ही नहीं, कामनाके कारण वह साध्यरूप भगवान्‌को भी कामनापूर्तिका साधन बना लेता है । तात्पर्य है कि वह कोई भी कामना रखकर भगवान्‌का भजन करता है तो उसका साध्य तो वह काम्य पदार्थ होता है और भगवान्‌ उसकी प्राप्तिके साधन होते हैं । जबतक कामना रहती है, तबतक मनुष्य पराधीन रहता है । पराधीन मनुष्य न तो त्याग कर सकता है, न सेवा कर सकता है और न प्रेम ही कर सकता है । वह न तो ज्ञानयोगी बन सकता है, न कर्मयोगी बन सकता है और न भक्तियोगी ही बन सकता है । अतः पराधीनताको मिटानेके लिये निष्काम होना बहुत आवश्यक है ।

कामनाकी पूर्तिमें तो सब मनुष्य पराधीन हैं, पर कामनाका त्याग करनेमें सब-के-सब मनुष्य स्वाधीन और समर्थ हैं । प्रत्येक मनुष्य स्वाधीनतापूर्वक स्वाधीनता (मुक्ति)-की प्राप्ति कर सकता है । परन्तु जबतक मनुष्यके भीतर कामना रहती है, तबतक वह स्वाधीन नहीं हो सकता । पराधीनताका सर्वथा नाश निष्काम होनेपर ही सम्भव है । निष्काम होनेपर साधक संसारपर विजय प्राप्त कर लेता है । कारण कि कामनावाले मनुष्यको कइयोंके अधीन होना पड़ता है, पर जिसको कुछ नहीं चाहिये, उसको किसीके भी अधीन नहीं होना पड़ता । उसका मूल्य संसारसे अधिक हो जाता है । वह तीनों योगोंका अधिकारी बन जाता है । इतना ही नहीं, वह भगवत्प्रेमका भी पात्र बन जाता है; क्योंकि कामनावाला मनुष्य किसीसे प्रेम नहीं कर सकता ।

जब कर्ता निष्काम होता है, तब उसके द्वारा स्वतः कर्तव्य-कर्मका पालन होने लगता है । कर्ता निष्काम हुए बिना कर्तव्य-कर्मका पालन नहीं होता और कर्तव्य-कर्मका पालन हुए बिना प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग नहीं होता । सकाम मनुष्य प्राप्त परिस्थितिके अधीन हो जाता है तथा अप्राप्त परिस्थितिका चिन्तन करता रहता है । परन्तु निष्काम होते ही मनुष्य प्राप्त परिस्थितिकी पराधीनता तथा अप्राप्त परिस्थितिके चिन्तनसे छूटकर परिस्थतिसे अतीत तत्त्वको प्राप्त कर लेता है ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘कल्याणके तीन सुगम मार्ग’ पुस्तकसे

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आजकी शुभ तिथि–
कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी, वि.सं.-२०७४, मंगलवार
श्रीधन्वन्तरी-जयन्ती, धनतेरस
कल्याणके तीन सुगम मार्ग



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 मिली हुई और बिछुड़नेवाली वस्तुओंको अपना और अपने लिये मानना मनुष्यकी भूल है । जब स्वयं चेतन तथा अविनाशी है तो फिर जड़ तथा नाशवान्‌ वस्तु अपनी और अपने लिये कैसे हुई ? यह भूल स्वतः-स्वाभाविक नहीं है, प्रत्युत मनुष्यके द्वारा उत्पन्न की हुई (कृत्रिम) है । अपने विवेकको महत्त्व न देनेसे यह भूल उत्पन्न होती है । इस एक भूलसे फिर अनेक तरहकी भूलें उत्पन्न होती हैं । इसलिये इस मूल भूलको मिटाना अत्यन्त आवश्यक है और इसको मिटानेकी जिम्मेवारी मनुष्यपर ही है । इसको मिटानेके लिये भगवान्‌ने मनुष्यको विवेक दिया है । जब मनुष्य अपने विवेकको महत्त्व देकर इस भूलको मिटा देता है, तब वह निर्मम हो जाता है ।

निर्मम होना प्रत्येक साधकके लिये बहुत आवश्यक है; क्योंकि ममताको मिटाये बिना साधककी उन्नति नहीं हो सकती । इतना ही नहीं, जिसमें ममता की जाती है, वह वस्तु भी अशुद्ध हो जाती है और उसकी उन्नतिमें भी बाधा लग जाती है । ममतासे मनुष्यमें अनेक दोषोंकी उत्पत्ति होती है ।

कुछ लोगोंको यह शंका होती है कि ममताके बिना हमारा शरीर कैसे चलेगा ? हम परिवार अथवा समाजकी सेवा कैसे करेंगे ? परन्तु वास्तवमें ममताके कारण शरीर, समाज, परिवार आदिकी सेवामें बाधा ही लगती है । निर्मम मनुष्यका शरीर-निर्वाह बहुत बढ़िया रीतिसे होता है । निर्मम मनुष्यके द्वारा ही परिवार, समाज आदिकी वास्तविक सेवा होती है । जिसकी अपने शरीरमें ममता है, वह परिवारकी सेवा नहीं कर सकता । जिसकी अपने परिवारमें ममता है, वह समाजकी सेवा नहीं कर सकता । जिसकी अपने समाजमें ममता है, वह देशकी सेवा नहीं कर सकता । जिसकी अपने देशमे ममता है, वह दुनियाकी सेवा नहीं कर सकता । तात्पर्य है कि ममताके कारण मनुष्यका भाव संकुचित, एकदेशीय हो जाता है । वह सेवासे विमुख होकर स्वार्थमें बँध जाता है । इसलिये साधकमात्रके लिये ममताका त्याग करना अत्यन्त आवश्यक है । जब साधकमें ममताका त्याग करनेकी तीव्र अभिलाषा जाग्रत्‌ हो जाती है, तब ममताका त्याग करना बड़ा सुगम हो जाता है । कारण कि जब साधक सच्चे हृदयसे संसारसे विमुख होकर परमात्माकी ओर चलना चाहता है, तब सम्पूर्ण संसार तथा स्वयं परमात्मा भी उसकी सहायता करनेके लिये तत्पर हो जाते हैं । इसलिये साधकको कभी भी अपने उद्देश्यकी पूर्तिसे निराश नहीं होना चाहिये । वह कम-से-कम आयुमें तथा कम-से-कम सामर्थ्यमें भी अपने उद्देश्यकी पूर्ति कर सकता है । कारण कि अपने उद्देश्यकी पूर्तिके लिये ही भगवान्‌ने अपनी अहैतुकी कृपासे उसको मानवशरीर दिया है‒

कबहुँक करि करुना नर देही । 
देत ईस   बिनु   हेतु  सनेही
                         (मानस, उत्तर ४४/३)

ममताके कारण ही कामनाओंकी उत्पत्ति होती है । जैसे, शरीरमें ममता होगी तो शरीरकी आवश्यकता हमारी आवश्यकता हो जायगी अर्थात्‌ अन्न, जल, वस्त्र, मकान आदिकी अनेक कामनाएँ उत्पन्न हो जायँगी । ममताका त्याग होते ही साधकमें कामना-त्यागकी सामर्थ्य आ जाती है । कारण कि शरीर और संसार एक ही धातुसे बने हुए हैं । शरीरको संसारसे अलग नहीं कर सकते । अतः शरीरकी ममताका नाश होते ही सांसारिक कामनाओंका भी नाश हो जाता है ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘कल्याणके तीन सुगम मार्ग’ पुस्तकसे

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