।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
माघ कृष्ण नवमी, वि.सं.२०७३, शनिवार
उद्देश्य


(गत ब्लॉगसे आगेका)

जब साधकका एकमात्र उद्देश्य परमात्मप्राप्तिका हो जाता है, तब उसके पास जो भी सामग्री (वस्तु परिस्थिति आदि) होती है, वह सब साधनरूप (साधन-सामग्री) हो जाती है ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
एक परमात्मप्राप्तिका दृढ़ उद्देश्य होनेसे अन्तःकरणकी जितनी शीघ्र और जैसी शुद्धि होती है, उतनी शीघ्र और वैसी शुद्धि अन्य किसी अनुष्ठानसे नहीं होती ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
इन्द्रियोंके द्वारा भोग तो पशु भी भोगते हैं, पर उन भोगोंको भोगना मनुष्य-जीवनका उद्देश्य नहीं है । मनुष्य-जीवनका उद्देश्य तो सुख-दुःखसे रहित तत्त्वको प्राप्त करना है ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग, भक्तियोग आदि सभी साधनोंमें एक दृढ़ निश्चय या उद्देश्यकी बड़ी आवश्यकता है । यदि अपने कल्याणका उद्देश्य ही दृढ़ नहीं होगा तो साधनसे सिद्धि कैसे मिलेगी ?
ᇮ     ᇮ     ᇮ
एक परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य होनेपर कोई भी साधन छोटा-बड़ा नहीं होता ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
वास्तवमें परमात्मप्राप्तिके सिवाय मनुष्य-जीवनका अन्य कोई प्रयोजन है ही नहीं । आवश्यकता केवल इस प्रयोजन या उद्देश्यको पहचानकर इसे पूरा करनेकी है ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
उद्देश्य मनुष्यकी प्रतिष्ठा है । जिसका कोई उद्देश्य नहीं है, वह वास्तवमें मनुष्य कहलाने योग्य नहीं है ।
उन्नति
जो वस्तु, परिस्थिति आदि अभी नहीं है, उसको प्राप्त करनेमें अपनी उन्नति, सफलता या चतुराई मानना महान् मूल है । जो वस्तु अभी नहीं है, वह मिलनेके बाद भी सदा नहीं रहेगी‒यह नियम है । जो सदासे है और सदा रहेगी, ऐसी वस्तु (परमात्मतत्त्व) को प्राप्त करनेमें हो वास्तविक उन्नति, सफलता या चतुराई है ।

ᇮ     ᇮ     ᇮ

  (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘अमृतबिन्दु’ पुस्तकसे 

|
।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
माघ कृष्ण अष्टमी, वि.सं.२०७३, शुक्रवार
अहंता (मैं-पन्)


(गत ब्लॉगसे आगेका)

मैं-पन ही मात्र संसारका बीज है ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
शरीरको मैं-मेरा माननेसे तरह-तरहके और अनन्त दुःख आते हैं ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
एक अहम्‌के त्यागसे अनन्त सृष्टिका त्याग हो जाता है; क्योंकि अहम्‌ने ही सम्पूर्ण जगत्‌को धारण कर रखा है ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
 ‘मैं बन्धनमें हूँ’इसमें जो ‘मैं’ है, वही ‘मैं मुक्त हूँ’ अथवा ‘मैं ब्रह्म हूँ’इसमें भी है ! इस ‘मैं’ (अहम्) का मिटना ही वास्तवमें मुक्ति है ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
जगत्, जीव और परमात्मा‒ये तीनों एक ही हैं, पर अहंताके कारण ये तीन दीखते हैं ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
वास्तवमें असंगता शरीरसे ही होनी चाहिये । समाजसे असंगता होनेपर अहंता (व्यक्तित्व) मिटती नहीं, प्रत्युत दृढ़ होती है ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
हमारा स्वरूप चिन्मय सत्तामात्र है और उसमें अहम् नहीं है‒यह बात यदि समझमें आ जाय तो इसी क्षण जीवन्मुक्ति है ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
संघर्ष जाति या धर्मको लेकर नहीं होता, प्रत्युत अहंकारसे पैदा होनेवाले स्वार्थ और अभिमानको लेकर होता है ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
अपनेमें विशेषता देखना अहंताको, परिच्छिन्नताको, देहाभिमानको पुष्ट करता है ।
भगवान्‌से उत्पन्न हुई सृष्टि भगवद्‌रूप ही है, पर जीव अहंता, आसक्ति, रागके कारण उसको जगद्‌रूप बना लेता है ।
उद्देश्य
जिसके लिये मनुष्यजन्म मिला है, उस परमात्मप्राप्तिका ही उद्देश्य हो जानेपर मनुष्यको सांसारिक सिद्धि-असिद्धि बाधा नहीं दे सकती ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
जैसे रोगीका उद्देश्य नीरोग होना है, ऐसे ही मनुष्यका उद्देश्य अपना कल्याण करना है । सांसारिक सिद्धि-असिद्धिको महत्त्व न देनेसे अर्थात् उनमें सम रहनेसे ही उद्देश्यकी सिद्धि होती है ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ

  (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘अमृतबिन्दु’ पुस्तकसे 

|
।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
माघ कृष्ण सप्तमी, वि.सं.२०७३, गुरुवार
अभिमान


स्वार्थ और अभिमानका त्याग किये बिना मनुष्य श्रेष्ठ नहीं बन सकता ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
जहाँ जातिका अभिमान होता है, वहाँ भक्ति होनी बड़ी कठिन है; क्योंकि भक्ति स्वयंसे होती है, शरीरसे नहीं । परन्तु जाति शरीरकी होती है, स्वयंकी नहीं ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
जबतक स्वार्थ और अभिमान हैं, तबतक किसीके भी साथ प्रेम नहीं हो सकता ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
अभिमानी आदमीसे सेवा तो कम होती है, पर उसको पता लगता है कि मैंने ज्यादा सेवा की । परन्तु निरभिमानी आदमीको पता तो कम लगता है, पर सेवा ज्यादा होती है ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
बुद्धिमानीका अभिमान मूर्खतासे पैदा होता है ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
जो चीज अपनी है, उसका अभिमान नहीं होता और जो चीज अपनी नहीं है, उसका भी अभिमान नहीं होता । अभिमान उस चीजका होता है, जो अपनी नहीं है, पर उसको अपनी मान लिया ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
जितना जानते हैं, उसीको पूरा मानकर जानकारीका अभिमान करनेसे मनुष्य ‘नास्तिक’ बन जाता है । जितना जानते हैं, उसमें सन्तोष न करनेसे तथा जानकारीका अभाव खटकनेसे मनुष्य ‘जिज्ञासु’ बन जाता है ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
जिन सम्प्रदाय, मत, सिद्धान्त, ग्रन्थ, व्यक्ति आदिमें अपने स्वार्थ और अभिमानके त्यागकी मुख्यता रहती है, वे महान् श्रेष्ठ होते हैं । परन्तु जिनमें अपने स्वार्थ और अभिमानकी मुख्यता रहती है, वे महान् निकृष्ट होते हैं ।


  (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘अमृतबिन्दु’ पुस्तकसे 

|
।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
माघ कृष्ण षष्ठी, वि.सं.२०७३, बुधवार
अविनाशी सुख


अपने लिये सुख चाहनेसे नाशवान् सुख मिलता है और दूसरोंको सुख पहुँचानेसे अविनाशी सुख मिलता है ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
सुख भोगनेके लिये स्वर्ग है तथा दुःख भोगनेके लिये नरक है और सुख-दुःख दोनोंसे ऊँचे उठकर महान् आनन्द प्राप्त करनेके लिये यह मनुष्यलोक है ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
संसारके सम्बन्ध-विच्छेदसे जो सुख मिलता है, वह संसारके सम्बन्धसे कभी मिल सकता ही नहीं ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
जबतक नाशवान्‌का सुख लेते रहेंगे, तबतक अविनाशी सुखकी प्राप्ति नहीं होगी ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
भोगोंका नाशवान् सुख तो नीरसतामें बदल जाता है और उसका अन्त हो जाता है, पर परमात्माका अविनाशी सुख सदा सरस रहता है और बढ़ता ही रहता है ।
अभिमान
अच्छाईका अभिमान बुराईकी जड़ है ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
स्वार्थ और अभिमानका त्याग करनेसे साधुता आती है ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
अपनी बुद्धिका अभिमान ही शास्त्रोंकी, सन्तोंकी बातोंको अन्तःकरणमें टिकने नहीं देता ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
वर्ण, आश्रम आदिकी जो विशेषता है, वह दूसरोंकी सेवा करनेके लिये है, अभिमान करनेके लिये नहीं ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
आप अपनी अच्छाईका जितना अभिमान करोगे, उतनी ही बुराई पैदा होगी । इसलिये अच्छे बनो, पर अच्छाईका अभिमान मत करो ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
ज्ञान मुक्त करता है, पर ज्ञानका अभिमान नरकोंमें ले जाता है ।
ᇮ     ᇮ     ᇮ
सांसारिक वस्तुके मिलनेपर तो अभिमान आ सकता है, पर भगवान्‌के मिलनेपर अभिमान आ सकता ही नहीं, प्रत्युत अभिमानका सर्वथा नाश हो जाता है ।

  (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘अमृतबिन्दु’ पुस्तकसे 

|