।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद कृष्ण एकादशी, वि.सं.२०७३, रविवार
जया एकादशी-व्रत (सबका)
गीतामें अवतारवाद


(गत ब्लॉगसे आगेका)

इस तरह अज, अविनाशी और ईश्वर रहते हुए अवतार लेनेवाले मुझ महेश्वरके परमभावको न जानते हुए जो लोग मेरेको मनुष्य मानकर मेरी अवहेलना, तिरस्कार करते हैं, वे मूढ़ (मूर्ख) हैं । मूढ़लोग आसुरी, राक्षसी और मोहिनी प्रकृतिका आश्रय लेकर जो कुछ आशा करते हैं, जो कुछ शुभकर्म करते हैं, जो कुछ विद्या प्राप्त करते हैं, वह सब व्यर्थ हो जाता है अर्थात् सत्-फल देनेवाला नहीं होता (९ । ११-१२) । जो मेरे सर्वश्रेष्ठ अविनाशी परमभावको न जानते हुए मुझ अव्यक्त परमात्माको जन्मने-मरनेवाला मानते हैं, वे मनुष्य बुद्धिहीन हैं । ऐसे मनुष्योंके सामने मैं अपने असली रूपसे प्रकट नहीं होता (७ । २४-२५) ।

जैसे खेलमें कोई स्वाँग बनाता है तो वह हरेकको अपना वास्तविक परिचय नहीं देता । अगर वह अपना वास्तविक परिचय दे दे तो खेल बिगड़ जायगा । ऐसे ही जब भगवान् अवतार लेते हैं, तब वे सबके सामने अपने-आपको प्रकट नहीं करते, सबको अपना वास्तविक परिचय नहीं देते‒‘नाहं प्रकाशः सर्वस्य’ (७ ।२५) । अगर वे अपना वास्तविक परिचय दे दें तो फिर वे लीला नहीं कर सकते । जैसे खेल खेलनेवालेका स्वाँग देखकर उसका आत्मीय मित्र डर जाता है तो वह स्वाँगधारी अपने मित्रको संकेतरूपसे अपना असली परिचय देता है कि ‘अरे ! तू डर मत, मैं वही हूँ’ । ऐसे ही भगवान्‌के अवतारी शरीरोंको देखकर कोई भक्त डर जाता है तो भगवान् उसको अपना असली परिचय देते हैं कि ‘भैया ! तू डर मत, मैं तो वही हूँ ।’

दो मित्र थे । एकने बाजारमें अपनी दूकान फैला रखी थी, जिससे लोग माल देखें और खरीदें । दूसरा राजकीय सिपाही का स्वांग धारण करके उसके पास गया और उसको खूब धमकाने लगा कि ‘अरे ! तूने यहाँ रास्तेमें दूकान क्यों लगा रखी है ? जल्दी उठा, नहीं तो अभी राजमें तेरी खबर करता हूँ ।’ उसकी बातोंसे वह दूकानदार मित्र बहुत डर गया और अपनी दूकान समेटने लगा । उसको भयभीत देखकर सिपाही बना हुआ मित्र बोला‒‘अरे ! तू डर मत, मैं तो वही तेरा मित्र हूँ ।’ ऐसे ही अर्जुनके सामने भगवान् विश्वरूपसे प्रकट हो गये तो अर्जुन डर गये । तब भगवान्‌ने अपना असली परिचय देकर अर्जुनको सान्त्वना दी ।

यहाँ एक शंका होती है कि वर्तमानमें धर्मका ह्रास हो रहा है और अधर्म बढ़ रहा है तथा श्रेष्ठ पुरुष दुःख पा रहे हैं, फिर भी भगवान् अवतार क्यों नहीं ले रहे हैं ? इसका समाधान यह है कि अभी भगवान्‌के अवतारका समय नहीं आया है । कारण कि शास्त्रोंमें कलियुगमें जैसा बर्ताव होना लिखा है, उससे भी ज्यादा बर्ताव गिर जाता है, तब भगवान् अवतार लेते हैं । अभी ऐसा नहीं हुआ है । त्रेतायुगमें तो राक्षसोंने ऋषि-मुनियोंको खा-खाकर हड्डियोंका ढेर कर दिया था, तब भगवान्‌ने अवतार लिया था । अभी कलियुगको देखते हुए वैसा अन्याय-अत्याचार नहीं हो रहा है । धर्मका थोड़ा ह्रास होनेपर भगवान् कारकपुरुषोंको भेजकर उसकी ठीक कर देते हैं अथवा जगह-जगह सन्त-महात्मा प्रकट होकर अपने आचरणों एवं वचनोंके द्वारा मनुष्योंको सन्मार्गपर लाते हैं ।

  (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘गीता-दर्पण’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद कृष्ण दशमी, वि.सं.२०७३, शनिवार
एकादशी-व्रत कल है
गीतामें अवतारवाद


सर्वागमेषु   ये   प्रोक्ता   अवतारा   जगत्प्रभोः ।
तद्रहस्यं  हि  गीतायां  कृष्णेन  कथितं  स्वयम् ॥

अपनी स्थितिसे नीचे उतरता है, उसको ‘अवतार’ कहते हैं । जैसे, कोई शिक्षक बालकको पढ़ाता है तो वह उसकी स्थितिमें आकर पढ़ाता है अर्थात् वह स्वयं ‘क, , ग’ आदि अक्षरोंका उच्चारण करता है और उस बालकसे उनका उच्चारण करवाता है तथा उसका हाथ पकड़कर उससे उन अक्षरोंको लिखवाता है । यह बालकके सामने शिक्षकका अवतार है । गुरु भी अपने शिष्यकी स्थितिमें आकर अर्थात् शिष्य जैसे समझ सके, वैसी ही स्थितिमें आकर उसकी बुद्धिके अनुसार उसको समझाते हैं । ऐसे ही मनुष्योंको व्यवहार और परमार्थकी शिक्षा देनेके लिये भगवान् मनुष्योंकी स्थितिमें आते हैं, अवतार लेते हैं ।

भगवान् मनुष्योंकी तरह जन्म नहीं लेते । जन्म न लेनेपर भी वे जन्मकी लीला करते हैं अर्थात् मनुष्योंकी तरह माँके गर्भमें आते हैं; परन्तु मनुष्यकी तरह गर्भाधान नहीं होता । जब भगवान् श्रीकृष्ण माँ देवकीजीके गर्भमें आते हैं, तब वे पहले वसुदेवजीके मनमें आते हैं तथा नेत्रोंके द्वारा देवकीजीमें प्रवेश करते हैं और देवकीजी मनसे ही भगवान्‌को धारण करती हैं ।[1] गीतामें भगवान् कहते हैं कि मैं अज (अजन्मा) रहते हुए ही जन्म लेता हूँ अर्थात् मेरा अजपना ज्यों-का-त्यों ही रहता है । मैं अव्ययात्मा (स्वरूपसे नित्य) रहते हुए ही अन्तर्धान हो जाता हूँ अर्थात् मेरे अव्ययपनेमें कुछ भी कमी नहीं आती । मैं सम्पूर्ण प्राणियोंका, सम्पूर्ण लोकोंका ईश्वर (मालिक) रहते हुए ही माता-पिताकी आज्ञाका पालन करता हूँ अर्थात् मेरे ईश्वरपनेमें, मेरे ऐश्वर्यमें कुछ भी कमी नहीं आती । मनुष्य तो अपनी प्रकृति-(स्वभाव-) के परवश होकर जन्म लेते हैं, पर मैं अपनी प्रकृतिको अपने वशमें करके स्वतन्त्रतापूर्वक स्वेच्छानुसार अवतार लेता हूँ (४ । ६) ।

भगवान् अपने अवतार लेनेका समय बताते हुए कहते हैं कि जब-जब धर्मका ह्रास होता है और अधर्म बढ़ जाता है, तब-तब मैं अवतार लेता हूँ, प्रकट हो जाता हूँ (४ । ७) । अपने अवतारका प्रयोजन बताते हुए भगवान् कहते हैं कि भक्तजनोंकी, उनके भावोंकी रक्षा करनेके लिये, अन्याय-अत्याचार करनेवाले दुष्टोंका विनाश करनेके लिये और धर्मकी भलीभाँति स्थापना, पुनरुत्थान करनेके लिये मैं युग-युगमें अवतार लेता हूँ (४ । ८) ।

  (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘गीता-दर्पण’ पुस्तकसे



[1] ततो  जगन्मङ्गलमच्युतांशं   समाहितं शूरसुतेन   देवी ।
       दधार सर्वात्मकमात्मभूतं काष्ठा यथाऽऽनन्दकरं मनस्तः ॥
                                            (श्रीमद्भा १० । २ । १८)  

‘......यथा दीक्षाकाले गुरुः शिष्याय ध्यानमुपदिशति शिष्यश्च ध्यानोक्तां मूर्तिं हृदि निवेशयति तथा वसुदेवो देवकीदृष्टौ स्वदृष्टिं निदधौ । दृष्टिद्वारा च हरिः संक्रामन् देवकीगर्भे आविर्बभूव । एतेन रेतोरूपेणाधानं निरस्तम् ॥' (अन्वितार्थप्रकाशिका)

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद कृष्ण नवमी, वि.सं.२०७३, शुक्रवार
उदयव्यापिनी रोहिणी मतावलम्बी वैष्णवोंका
श्रीकृष्णजन्माष्टमी-व्रत
गीतामें श्रीकृष्णकी भगवत्ता


(गत ब्लॉगसे आगेका)

गीतामें भगवान् श्रीकृष्णने जगह-जगह अपने-आपको भगवान् कहा है; जैसे‒

मैं सम्पूर्ण प्राणियोंका ईश्वर होते हुए ही अवतार लेता हूँ (४ । ६) । मैं सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें अच्छी तरहसे स्थित हूँ (१५ । १५) । जो लोग अपनेमें और दूसरोंके शरीरोंमें स्थित मुझ अन्तर्यामी ईश्वरके साथ द्वेष करते हैं, उनको मैं आसुरी योनियोंमें गिराता हूँ (१६ । १८-१९) । जो अश्रद्धालु मनुष्य दम्भ, अहंकार, कामना, आसक्ति और हठसे युक्त होकर शास्त्रविधिसे रहित घोर तप करते हैं, वे अपने पाञ्चभौतिक शरीरको तथा अन्तःकरणमें स्थित मुझ ईश्वरको भी कष्ट देते हैं (१७ । ५- ६) ।

अन्वय-व्यतिरेकसे भी अपने ईश्वरपनेका वर्णन करते हुए भगवान्‌ने कहा है कि जो मेरेको सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर मानते हैं, वे शान्तिको प्राप्त होते हैं (५ । २९) तथा जो मेरेको अज, अविनाशी और महान् ईश्वर मानते हैं, वे मोहसे एवं सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाते हैं (१० । ३) । परन्तु जो मेरे ईश्वरभावको न जानते हुए मेरेको मनुष्य मानकर मेरी अवहेलना करते हैं, वे मूढ़ (मूर्ख) हैं (९ । ११) । जो मेरेको सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता तथा सम्पूर्ण संसारका मालिक नहीं मानते, उनका पतन हो जाता है (९ । २४) ।

जिस ज्ञेय-तत्त्वको जाननेसे अमरताकी प्राप्ति होती है (१३ । १२), वह ज्ञेय-तत्त्व मैं ही हूँ; क्योंकि सम्पूर्ण वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य तत्त्व मैं ही हूँ (१५ । १५) । मैं सम्पूर्ण जगत्‌को पैदा करनेवाला हूँ । मेरे सिवाय इस जगत्‌की रचना करनेवाला दूसरा कोई नहीं है । मैं ही सम्पूर्ण जगत्‌में ओतप्रोत हूँ (७ । ६-७) । सात्त्विक, राजस और तामस भाव (क्रिया, पदार्थ आदि) मेरेसे ही उत्पन्न होते हैं (७ । १२) । प्राणियोंके बुद्धि, ज्ञान, असम्मोह आदि भाव मेरेसे ही पैदा होते हैं (१० । ४-५) । चर-अचर, स्थावर-जंगम आदि कोई भी वस्तु, प्राणी मेरेसे रहित नहीं है (१० । ३९) सम्पूर्ण जगत् मेरे किसी एक अंशमें स्थित है (१० । ४२) ।

मैं ही अपनी प्रकृतिको वशमें करके संसारकी रचना करता हूँ (९ । ८) अथवा मेरी अध्यक्षतामें अर्थात् मेरेसे सत्ता-स्फूर्ति पाकर प्रकृति संसारकी रचना करती है (९ । १०) ।

दसवें अध्यायमें बीसवेंसे अड़तीसवें श्लोकतक कही हुई विभूतियोंमें भगवान्‌ने अपने-आपको बताया है । फिर ग्यारहवें अध्यायमें भगवान्‌ने अर्जुनको दिव्यदृष्टि देकर अपना अव्यय, अविनाशी, दिव्य विराट्‌रूप दिखाया । जब अत्युग्र विराट्‌रूपको देखकर अर्जुन भयभीत हो गये, तब भगवान्‌ने अपना चतुर्भुजरूप दिखाकर उनको सान्त्वना दी और फिर वे द्विभुजरूप हो गये, आदि-आदि । तात्पर्य है कि अगर श्रीकृष्ण योगी हैं तो वे सत्य बोलते हैं और अगर सत्य बोलते है तो वे ईश्वर है; क्योंकि स्वयं श्रीकृष्णने अपनेको ईश्वर कहा है । अतः जो श्रीकृष्णको योगी मानते हैं, उनको ‘श्रीकृष्ण ईश्वर हैं’‒यह मानना ही पड़ेगा ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒‘गीता-दर्पण’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, वि.सं.२०७३, गुरुवार
श्रीकृष्णजन्माष्टमी-व्रत
गीतामें श्रीकृष्णकी भगवत्ता


(गत ब्लॉगसे आगेका)

भगवान् कहते हैं कि मैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें व्याप्त हूँ और सम्पूर्ण प्राणी मेरेमें स्थित हैं तथा मैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें नहीं हूँ और सम्पूर्ण प्राणी मेरेमें नहीं हैं, अर्थात् सब कुछ मैं-ही-मैं हूँ (९ । ४-५)‒यह विद्या (राजविद्या) है । आसुर भाववाले मूढ़ मनुष्य मेरे शरण नहीं होते (७ । १५)‒यह अविद्या है । इस तरह भगवान् श्रीकृष्ण विद्या और अविद्याको जानते हैं ।

इस प्रकार सम्पूर्ण प्राणियोंके उत्पत्ति-प्रलय, आवागमन और विद्या-अविद्याको जाननेके कारण श्रीकृष्ण साक्षात् भगवान् हैं‒यह सिद्ध होता है ।

मनुष्य अच्छे कर्म करके, साधन करके ऊँची स्थितिको प्राप्त हो जाता है तो लोग उसको महापुरुष कहने लग जाते हैं । जो लोग यह मानते हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण भी एक महापुरुष थे, उनका यह मानना बिलकुल गलत है । भगवान् श्रीकृष्ण अवतार थे । जो साधन करके ऊँचा उठता है, उसका नाम ‘उत्तार’ है, अवतार नहीं । अवतार नाम उसका है, जो अपनी स्थितिमें स्थित रहते हुए ही किसी विशेष कार्यको करनेके लिये नीचे उतरता है अर्थात् मनुष्य आदिके रूपमें प्रकट होता है । जैसे, कोई आचार्य किसी बच्चेको वर्णमाला सिखाता है तो वह ‘अ, , , ' आदि स्वरोंका और ‘क, , , ध’ आदि व्यञ्जनोंका स्वयं उच्चारण करता है और उस बच्चेसे भी उनका उच्चारण करवाता है और उसका हाथ पकड़कर उससे लिखवाता है । इस प्रकार उस बच्चेको वर्णमाला सिखानेके लिये स्वयं भी बार-बार वर्णमालाका उच्चारण करना और उसको लिखना‒यह उस आचार्यका बच्चेकी श्रेणीमें अवतार लेना है, उसकी श्रेणीमें आना है । बच्चेकी श्रेणीमें आनेपर भी उसकी विद्वता वैसी-की-वैसी ही बनी रहती है । ऐसे ही सन्तोंकी रक्षा, दुष्टोंका विनाश और धर्मकी स्थापना करनेके लिये भगवान् अज (अजन्मा) रहते हुए ही जन्म लेते हैं, अविनाशी रहते हुए ही अन्तर्धान हो जाते हैं और सम्पूर्ण प्राणियोंके ईश्वर (मालिक) रहते हुए ही माता-पिताके आज्ञापालक बन जाते हैं (४ । ६) । अवतार लेनेपर भी उनके अज, अविनाशी और ईश्वरपनेमें कुछ भी कमी नहीं आती, वे ज्यों-कें-त्यों ही बने रहते हैं ।

 जो लोग यह मानते है कि भगवान् श्रीकृष्ण एक योगी थे, भगवान् नहीं थे उनका यह मानना बिलकुल गलत है । योगी वही होता है, जिसमें योग होता है । योगके आठ अंग हैं, जिनमें सबसे पहले ‘यम’ आता है । यम पाँच हैं‒अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह । अतः जो योगी होगा, वह सत्य ही बोलेगा । अगर वह असत्य बोलता है तो वह योगी नहीं हो सकता; क्योंकि उसने योगके पहले अंग-(यम-) का भी पालन नहीं किया ! अतः भगवान् श्रीकृष्णको योगी माननेसे उनको भगवान् भी मानना ही पड़ेगा; क्योंकि गीतामें भगवान् श्रीकृष्णने जगह-जगह अपने-आपको भगवान् कहा है ।

  (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘गीता-दर्पण’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद कृष्ण सप्तमी, वि.सं.२०७३, बुधवार
गीतामें श्रीकृष्णकी भगवत्ता


नरो न योगी न तु कारकश्च          नांशावतारो न नयप्रवीणः ।
भवाश्रयत्वाच्च गुणाश्रयत्वात्कृष्णस्तु साक्षाद् भगवान्‌ स्वयं हि ॥

शास्त्रमें भगवत्ताके लक्षण इस प्रकार बताये गये हैं‒

उत्पत्तिं  प्रलयं  चैव   भूतानामागतिं   गतिम् ।
वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति ॥
                                                                 (विष्णुपुराण ६ । ५ । ७८)

‘जो सम्पूर्ण प्राणियोके उत्पत्ति-प्रलय एवं आवागमनको और विद्या-अविद्याको जानता है, उसका नाम भगवान् है ।’

गीताको देखनेसे पता चलता है कि भगवत्ताके ये सभी लक्षण भगवान् श्रीकृष्णमें विद्यमान हैं; जैसे‒

भगवान् गीतामें कहते हैं‒महासर्गके आदिमें मैं अपनी प्रकृतिको वशमें करके सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति करता हूँ और महाप्रलयके समय सम्पूर्ण प्राणी मेरी प्रकृतिको प्राप्त हो जाते हैं (९ । ७-८) । ब्रह्माजीके दिनके आरम्भमें (सर्गके आदिमें) सम्पूर्ण प्राणी ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरसे पैदा हो जाते हैं और ब्रह्माजीकी रातके आरम्भमें (प्रलयके समय) सम्पूर्ण प्राणी ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरमें लीन हो जाते हैं । (८ । १८-१९) । इस तरह भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण प्राणियोंके उत्पत्ति-प्रलयको जानते हैं ।

भगवान् कहते हैं कि मैं भूतकालके, वर्तमानके और भविष्यके सभी प्राणियोंको जानता हूँ (७ । २६) । जो स्वर्गप्राप्तिकी इच्छासे यज्ञ, दान आदि शुभकर्म करके स्वर्गादि लोकोंमें जाते हैं, वे उन लोकोंमें अपने पुण्योंका फल भोगकर पुनः मृत्युलोकमें आ जाते हैं (९ । २०-२१) । शुक्ल और कृष्ण‒ये दो गतियाँ (मार्ग) हैं । इसमेंसे शुक्लगतिसे गया हुआ प्राणी लौटकर नहीं आता और कृष्णगतिसे गया हुआ प्राणी लौटकर आता है (८ । २६) । आसुर स्वभाववाले प्राणी बार-बार आसुरी योनियोंमें जाते हैं और फिर वे उससे भी अधम गतिमें अर्थात् भयंकर नरकोंमें चले जाते हैं (१६ । १९‒२०) । इस तरह भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण प्राणियोंके आवागमनको जानते हैं ।

अर्जुन भगवान्‌से कहते हैं कि गतियोंके विषयमें आपके सिवाय दूसरा कोई नहीं बता सकता, आप ही मेरे गतिविषयक सन्देहको मिटा सकते हैं (६ । ३९) । अर्जुनके इस कथनसे भी सिद्ध होता है कि प्राणियोंकी गतियोंको, आवागमनको भगवान् श्रीकृष्ण पूर्णतया जानते हैं ।

  (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘गीता-दर्पण’ पुस्तकसे

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