।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
पौष शुक्ल सप्तमी, वि.सं.२०७१, रविवार
मानसमें नाम-वन्दना

                                                     
                     
              



 
 (गत ब्लॉगसे आगेका)

यह अपने हृदयकी बात है । मेरे निर्धनका धन यही है । कैसा बढ़िया धन है यह ! अन्तमें कहते हैं यह जो रत्न-मणि, सोना आदि है, इनसे मेरे मतलब नहीं है । ये पत्थरके टुकड़े हैं । इनसे क्या काम ! निर्धनका असली धन तो रामनाम है ।

धनवन्ता सोइ जानिये जाके रामनाम धन होय ।

यह धन जिसके पास है, वही धनी है । उसके बिना कंगले हैं सभी ।

सम्मीलने नयनयोर्न हि किञ्चिदस्ति ।

करोड़ों रुपये आज पासमें हैं, पर ये दोनों आँखें सदाके लिये जिस दिन बन्द हो गयीं, उस दिन कुछ नहीं है । सब यहाँका यहीं रह जायगा ।

सुपना सो हो जावसी सुत कुटुम्ब धन धाम ।

यह स्वप्नकी तरह हो जायगा । आँख खुलते ही स्वप्न कुछ नहीं और आँख मिचते ही यहाँका धन कुछ नहीं ।

स्थूल बुद्धिवाले बिना समझे कह देते हैं कि रामनामसे क्या होता है ? वे बेचारे इस बातको जानते नहीं, उन्हें पता ही नहीं है । इस विद्याको जाननेवाले ही जानते हैं भाई ! सच्ची लगन जिसके लगी है वह जानता है । दूसरोंको क्या पता ? जिसके लागी है सोई जाने दूजा क्या जाने रे भाई’ भगवान्‌का नाम लेनेवालोंका बड़े-बड़े लोकोंमें जहाँ जाते हैं, वहाँ आदर होता है कि भगवान्‌के भक्त पधारे हैं । हमारा लोक पवित्र हो जाय । भगवन्नामसे रोम-रोम, कण-कण पवित्र हो जाता है, महान् पवित्रता छा जाती है । ऐसा भगवान्‌का नाम है । जिसके हृदयमें नामके प्रति प्रेम जाग्रत् हो गया, वह असली धनी है । इससे भगवान् प्रकट हो जाते हैं । वह खुद ऐसा विलक्षण हो जाता है कि उसके दर्शन, स्पर्श, भाषणसे दूसरोंपर असर पड़ता है । नाम लेनेवाले सन्त-महात्माओंके दर्शनसे शान्ति मिलती है । अशान्ति दूर हो जाती है, शोक-चिन्ता दूर हो जाते हैं और पापोंका नाश हो जाता है । जहाँ वे रहते हैं, वे धाम पवित्र हो जाते हैं और जहाँ वे चलते हैं वहाँका वायुमण्डल पवित्र हो जाता है ।

प्रह्लादपर संत-कृपा

प्रह्लादजी महाराजपर नारदजीकी कृपा हो गयी । इन्द्रको हिरण्यकशिपुसे भय लगता था । हिरण्यकशिपु तपस्या करने गया हुआ था । पीछेसे इन्द्र उसकी स्त्री कयाधूको पकड़कर ले गया । बीचमें नारदजी मिल गये । उन्होंने कहा‒‘बेचारी अबलाका कोई कसूर नहीं है, इसको क्यों दुःख देता है भाई ! इन्द्रने कहा‒‘इसको दुःख नहीं देना है ! इसके गर्भमें बालक है । अकेले हिरण्यकशिपुने हमारेको इतना तंग कर दिया है, अगर यह बालक पैदा हो जायगा तो बाप और बेटा दो होनेपर हमारी क्या दशा करेंगे । इसलिये बालक जन्मेगा, तब उसे मार दूँगा, फिर काम ठीक हो जायगा ।’
   
   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘मानसमें नाम-वन्दना’ पुस्तकसे