।। श्रीहरिः ।।




आजकी शुभ तिथि–
   आश्विन कृष्ण अमावस्या, वि.सं.-२०७४,बुधवार
मातामह-श्राद्ध,
भगवान्‌ सबके गुरु है



         भगवान्‌ जगत्‌के गुरु हैं

कृष्णं वन्दे जगद्‌गुरुम्
जगद्‌गुरुं च शाश्वतम्
                            (मानस, अरण्य॰ ४/९)

वे केवल गुरु ही नहीं, प्रत्युत गुरुओंके भी परम गुरु हैं

           ‘स ईशः परमो गुरोर्गुरुः (श्रीमद्भा. ८/२४/५०)       
त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् (गीता ११/४३)

राजा सत्यव्रत भगवान्‌से कहते हैं

अचक्षुरन्धस्य यथाग्रणीः कृत-
स्तथा जनस्याविदुषोऽबुधो गुरुः ।
त्वमर्कदृक् सर्वदृशां समीक्षणो
वृतो गुरुर्नः स्वगतिं बुभुत्सताम् ॥
(श्रीमद्भागवत ८/२४/५०)

जैसे कोई अन्धा अन्धेको ही अपना पथ-प्रदर्शक बना ले, वैसे ही अज्ञानी जीव अज्ञानीको ही अपना गुरु बनाते हैं । आप सूर्यके समान स्वयं प्रकाश और समस्त इन्द्रियोंके प्रेरक हैं । हम आत्मतत्त्वके जिज्ञासु आपको ही गुरुके रूपमें वरण करते हैं ।

भक्तराज प्रह्लादजी कहते हैं

शास्ता विष्णुरशेषस्य जगतो यो हृदि स्थितः ।
तमृते परमात्मनां   तात   कः   केन  शास्यते ॥
                                      (विष्णुपुराण १/१७/२०)

हृदयमें स्थित भगवान्‌ विष्णु ही तो सम्पूर्ण जगत्‌के उपदेशक हैं । हे तात ! उन परमात्माको छोड़कर और कौन किसको कुछ सिखा सकता है ? नहीं सिखा सकता ।

भगवान्‌ जगत्‌के गुरु हैं और हम भी जगत्‌के भीतर ही हैं । इसलिये वास्तवमें हम गुरुसे रहित नहीं हैं । हम असली महान्‌ गुरुके शिष्य हैं । कलियुगी गुरुओंसे तो बड़ा खतरा है, पर जगद्गुरु भगवान्‌से कोई खतरा नहीं है ! कोर लाभ-ही-लाभ है, नुकसान कोई है ही नहीं । इसलिये भगवान्‌को गुरु मानें और उनकी गीताको पढ़े, उसके अनुसार अपना जीवन बनायें तो हमारा निश्चितरूपसे कल्याण हो जायगा । कृष्ण, राम, शंकर, हनुमान्, गणेश, सूर्य आदि किसीको भी अपना गुरु मान सकते हैं । गजेन्द्रने कहा था

यः कश्चनेशो बलिनोऽन्तकोरगात्
प्रचण्डवेगादभिधावतो भ्रुशम् ।
भीतं प्रपन्नं परिपाति यद्भया-
न्मृत्युः प्रधावत्यरणं तमीमहि ॥
(श्रीमद्भागवत ८/२/३३)

जो कोई ईश्वर प्रचण्ड वेगसे दौड़ते हुए अत्यन्त बलवान् कालरूपी साँपसे भयभीत होकर शरणमें आये हुएकी रक्षा करता है और जिससे भयभीत होकर मृत्यु भी दौड़ रही है, उसीकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ ।

गजेन्द्रके कथनका तात्पर्य है कि ईश्वर कैसा है, उसका क्या नाम हैयह सब मैं नहीं जानता, पर जो कोई ईश्वर है, उसकी मैं शरण लेता हूँ । इस प्रकार हम भी ईश्वरकी शरण हो जायँ तो वह गुरु भेज देगा अथवा स्वयं ही गुरु हो जायगा ।

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘क्या गुरु बिना मुक्ति नहीं ?’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।




आजकी शुभ तिथि–
   आश्विन कृष्ण चतुर्दशी, वि.सं.-२०७४,मंगलवार
चतुर्दशी, अमावस्या-श्राद्ध, पितृविसर्जन
कल्याणकी प्राप्तिमें अपनी लगन कारण



    (गत ब्लॉगसे आगेका)

अगर आप अपना उद्धार चाहते हैं तो उसमें बाधा कौन दे सकता है ? और अगर आप अपना उद्धार नहीं चाहते तो आपका उद्धार कौन कर सकता है ? कितने ही अच्छे गुरु हों, सन्त हों, पर आपकी इच्छाके बिना कोई आपका उद्धार नहीं कर सकता । अगर आप अपने उद्धारके लिये तैयार हो जाओ तो सन्त-महात्मा ही नहीं, चोर-डाकू भी आपकी सहायता करेंगे, दुष्ट भी आपकी सेवा करेंगे, सिंह, सर्प आदि भी आपकी सेवा करेंगे ! इतना ही नहीं, दुनियामात्र भी आपकी सेवा करनेवाली हो जायगी । मैंने ऐसा कई बार देखा है कि अगर सच्चे हृदयसे भगवान्‌में लगे हुए व्यक्तिको कोई दुःख देता है तो वह दुःख भी उसकी उन्नतिमें सहायक हो जाता है ! दूसरा तो उसको दुःख देनेकी नियतसे काम करता है, पर उसका भला हो जाता है ! इतना ही नहीं, जो भगवान्‌को नहीं मानता, उसमें भी अगर अपने कल्याणकी लगन पैदा हो जाय तो उसका भी कल्याण हो जाता है ।

धनी आदमी काम करनेके लिये नौकर रख लेते हैं, पूजन करनेके लिये ब्राह्मण रख लेते हैं, पर भोजन करने अथवा दवा लेनेके लिये कोई नौकर या ब्राह्मण नहीं रखता । भूख लगनेपर भोजन खुदको ही करना पड़ता है । रोगी होनेपर दवा खुदको ही लेनी पड़ती है । जब रोटी भी खुद खानेसे भूख मिटती है, दवा भी खुद लेनेसे रोग मिटता है, तो फिर कल्याण अपनी लगनके बिना कैसे हो जायगा ? आप तत्परतासे भगवान्‌में लग जाओ तो गुरु, सन्त, भगवान्‌‒ सब आपकी सहायता करनेके लिये तैयार हैं, पर कल्याण तो खुदको ही करना पड़ेगा । इसलिये गुरु हमारा कल्याण कर देगा‒ यह पूरी ठगाई है !

माँ कितनी ही दयालु क्यों न हो, पर आपकी भूख नहीं हो तो भोजन कैसे करायेगी ? ऐसे ही आपमें अपने कल्याणकी उत्कण्ठा न हो तो भगवान्‌ परम दयालु होते हुए भी क्या करेंगे ? चीर-हरणके समय द्रौपदीने भगवान्‌को पुकारा तो वे वस्त्ररूपसे प्रकट हो गये, पर जुएमें हारते समय युधिष्ठिरने भगवान्‌को पुकारा ही नहीं तो वे कैसे आयें ? युधिष्ठिरने तेरह वर्षोंतक वनमें दुःख पाया । कुन्ती माताने भगवान्‌ श्रीकृष्णसे कहा कि ‘कन्हैया ! क्या तेरेको पाण्डवोंपर दया नहीं आती ?’ भगवान्‌ने कहा कि ‘मैं क्या करूँ, युधिष्ठिरने जुएमें राज्य, धन-सम्पत्ति आदि सब कुछ लगा दिया, पर मेरेको याद ही नहीं किया !’

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

  ‒ ‘क्या गुरु बिना मुक्ति नहीं ?’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।




आजकी शुभ तिथि–
   आश्विन कृष्ण त्रयोदशी, वि.सं.-२०७४,सोमवार
त्रयोदशी-श्राद्ध
कल्याणकी प्राप्तिमें अपनी लगन कारण



        भगवान्‌ने गीतामें स्पष्ट कहा है‒

उद्धरेदात्मनात्मानं      नात्मनमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
                                                    (६/५)

         ‘अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे; क्योंकि आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है ।’

         तात्पर्य है कि अपने उद्धार और पतनमें मनुष्य स्वयं ही कारण है, दूसरा कोई नहीं । भगवान्‌ने मनुष्यशरीर दिया है तो अपने कल्याणकी सामग्री भी पूरी दी है । इसलिये अपने कल्याणके लिये दूसरेकी जरूरत नहीं है ।

         गुरु, सन्त और भगवान्‌ भी तभी उद्धार करते हैं, जब मनुष्य स्वयं उनपर श्रद्धा-विश्वास करता है, उनको स्वीकार करता है, उनके सम्मुख होता है, उनकी आज्ञाका पालन करता है । अगर मनुष्य उनको स्वीकार न करे तो वे कैसे उद्धार करेंगे ? नहीं कर सकते । खुद शिष्य न बने तो गुरु क्या करेगा ? जैसे, दूसरा व्यक्ति भोजन तो दे देगा, पर भूख खुदकी चाहिये । खुदकी भूख न हो तो दूसरेके द्वारा दिया गया बढ़िया भोजन भी किस कामका ? ऐसे ही खुदकी लगन न हो तो गुरुका, सन्त-महात्माओंका उपदेश किस कामका ?

         गुरु, सन्त और भगवान्‌का कभी अभाव नहीं होता । अनेक बड़े-बड़े अवतार हो गये, पर अभीतक हमारा उद्धार नहीं हुआ है ! इससे सिद्ध होता है कि हमने ही उनको स्वीकार नहीं किया । अतः अपने उद्धार और पतनमें हम ही हेतु हैं । जो अपने उद्धार और पतनमें दूसरेको हेतु मानता है, उसका उद्धार कभी हो ही नहीं सकता ।

         वास्तवमें मनुष्य आप ही अपना गुरु है‒ ‘आत्मनो गुरुरात्मैव पुरुषस्य विशेषतः’ (श्रीमद्भागवत ११/७/२०) । इसलिये उपदेश अपनेको ही दे । दूसरेमें कमी न देखकर अपनेमें ही कमी देखे और उसको दूर करनेकी चेष्टा करे । वह आप ही अपना गुरु बने, आप ही अपना नेता बने और आप ही अपना शासक बने । तात्पर्य हुआ कि वास्तवमें कल्याण न गुरुसे होता है और न ईश्वरसे ही होता है, प्रत्युत हमारी सच्‍ची लगनसे होता है । खुदकी लगनके बिना भगवान्‌ भी कल्याण नहीं कर सकते । अगर कर देते तो हम आजतक कल्याणसे वंचित क्यों रहते ? न तो गुरुका अभाव है, न सन्त-महात्माओंका अभाव है और न भगवान्‌का ही अभाव है । अभाव हमारी लगनका है । कल्याणकी प्राप्ति न गुरुके अधीन है, न सन्त-महात्माओंके अधीन है । जब हमारी लगनके बिना सर्वशक्तिमान भगवान्‌ भी हमारा कल्याण नहीं कर सकते, तो फिर मनुष्यमें कितनी शक्ति है कि हमारा कल्याण कर दे ? हमारी लगन नहीं होगी तो लाखों-करोड़ों गुरु बना लें तो भी कल्याण नहीं होगा । अगर हमारे हृदयकी सच्‍ची लगन होगी तो गुरु भी मिल जायगा, सन्त भी मिल जायँगे, भगवान्‌ भी मिल जायँगे, अच्छी पुस्तकें भी मिल जायँगी, ज्ञान भी मिल जायगा । कैसे मिलेगा, किस तरहसे मिलेगा‒यह भगवान्‌ जानें ! फल पककर तैयार होता है तो तोता आकर स्वयं उसको चोंच मारता है । ऐसे ही हम सच्‍चे शिष्य बन जायँ तो सच्‍चा गुरु खुद हमारे पास आयेगा । शिष्यको गुरुकी जितनी आवश्यकता रहती है, उससे अधिक आवश्यकता गुरुको चेलेकी रहती है ! हमारी लगन सच्‍ची होगी तो कोई कपटी गुरु भी मिल जायगा तो भगवान्‌ छुड़ा देंगे । हमें कोई अटका सकेगा ही नहीं । जिसके भीतर अपने उद्धारकी लगन होती है, वह किसी जगह अटकता (फँसता) नहीं‒यह नियम है ।च्‍चे जिज्ञासुको सच्‍चा सत्संग मिल जाय तो वह उसको चट पकड़ लेता है ।

     (शेष आगेके ब्लॉगमें)
  ‒ ‘क्या गुरु बिना मुक्ति नहीं ?’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।




आजकी शुभ तिथि–
   आश्विन कृष्ण द्वादशी, वि.सं.-२०७४,रविवार
द्वादशी-श्राद्ध, विश्वकर्मापूजा
भगवत्प्राप्ति गुरुके अधीन नहीं



    जिसको हम प्राप्त करना चाहते हैं, वह परमात्मतत्त्व एक जगह सीमित नहीं है, किसीके कब्जेमें नहीं है, अगर है तो वह हमें क्या निहाल करेगा ? परमात्मतत्त्व तो प्राणिमात्रको नित्य प्राप्त है । जो उस परमात्मातत्त्वको जाननेवाले महात्मा हैं, वे न गुरु बनाते हैं, न कोई फीस (भेंट) लेते हैं, प्रत्युत सबको चौड़े बताते हैं । जो गुरु नहीं बनते, वे जैसी तत्त्वकी बात बता सकते हैं, वैसी तत्त्वकी बात गुरु बनानेवाले नहीं बता सकते ।

सौदा करनेवाले व्यक्ति गुरु नहीं होते । जो कहते हैं कि पहले हमारे शिष्य बनो, फिर हम भगवत्प्राप्तिका रास्ता बतायेंगे, वे मानो भगवान्‌की बिक्री करते हैं । यह सिद्धान्त है कि कोई वस्तु जितने मूल्यमें मिलती है, वह वास्तवमें उससे कम मूल्यकी होती है । जैसे कोई घड़ी सौ रुपयोंमें मिलती है तो उसको लेनेमें दूकानदारके सौ रुपये नहीं लगे हैं । अगर गुरु बनानेसे ही कोई चीज मिलेगी तो वह गुरुसे कम दामवाली अर्थात्‌ गुरुसे कमजोर ही होगी । फिर उससे हमें भगवान्‌ कैसे मिल जायँगे ? भगवान्‌ अमूल्य हैं । अमूल्य वस्तु बिना मूल्यके मिलती है और जो वस्तु मूल्यसे मिलती है, वह मूल्यसे कमजोर होती है । इसलिये कोई कहे के मेरा चेला बनो तो मैं बात बताऊँगा, वहाँ हाथ जोड़ देना चाहिये ! समझ लेना चाहिये कि कोई कालनेमि है ! नकली गुरु बने हुए कालनेमि राक्षसने हनुमान्‌जीसे कहा था‒

सर मज्जन करि आतुर आवहु ।
दिच्छा देऊ ग्यान जेहिं पावहु ॥
                                               (मानस, लंकाकाण्ड ५७/४)

उसकी पोल खुलनेपर हनुमान्‌जीने कहा कि पहले गुरुदक्षिणा ले लो, पीछे मन्त्र देना और पूँछमें सिर लपेटकर उसको पछाड़ दिया !

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒ ‘क्या गुरु बिना मुक्ति नहीं ?’ पुस्तकसे

संसारके साथ एकता और परमात्मासे भिन्नता मानी हुई है ।
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विनाशीसे अपना सम्बन्ध माननेसे अन्तःकरण, कर्म और पदार्थ‒तीनों ही मलिन हो जाते हैं और विनाशीसे माना हुआ सम्बन्ध छूट जानेसे ये तीनों ही स्वतः पवित्र हो जाते हैं ।
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जबतक संसारसे संयोग बना रहता है, तबतक भोग होता है, योग नहीं । संसारके संयोगका मनसे सर्वथा वियोग होने़पर योग सिद्ध हो जाता है अर्थाक्त परमात्मासे अपने स्वतःसिद्ध नित्ययोगका अनुभव हो जाता है ।
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उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंका आश्रय लेकर, उनसे सम्बन्ध जोड़कर सुख चाहनेवाला मनुष्य कभी सुखी नहीं हो सकता‒यह नियम है ।
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(‘अमृत-बिन्दु’ पुस्तकसे)

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।। श्रीहरिः ।।




आजकी शुभ तिथि–
   आश्विन कृष्ण एकादशी, वि.सं.-२०७४,शनिवार
एकादशी-श्राद्ध, इन्दिरा एकादशी-व्रत (सबका)
कल्याणमें शिष्यकी मुख्यता



      गुरुजी किसी गद्दीके महन्त हों, उनके पास लाखों-करोड़ों रुपये हों तो उनसे रुपये प्राप्त करनेमें गुरुकी मुख्यता है । गुरु चेलेको स्वीकार करेगा, तभी चेलेको धन मिलेगा । गुरुकी मरजीके बिना चेला उनसे धन नहीं ले सकेगा । इस प्रकार धनकी प्राप्तिमें तो गुरुकी मुख्यता है, पर कल्याण और विद्याकी प्राप्तिमें चेलेकी ही मुख्यता है । अगर चेलेमें अपने कल्याणकी भूख न हो तो गुरु उसका कल्याण नहीं कर सकता । परन्तु चेलेमें अपने कल्याणकी भूख हो तो गुरुके द्वारा उसको स्वीकार न करनेपर भी वह अपना कल्याण कर लेगा ।

स्वामी रामानन्दजी महाराजने कबीरको शिष्य बनानेसे मना कर दिया तो वे एक दीन पंचगंगा घाटकी सीढ़ियोंपर लेट गये । रामानन्दजी महाराज स्नानके लिये वहाँसे गुजरे तो अनजानमें उनका पैर कबीरपर पड़ गया और वे ‘राम-राम’ बोल उठे । कबीरने ‘राम’ – नामको ही गुरुमन्त्र मान लिया और साधनामें लग गये । परिणाममें कबीर सन्तोंमें चक्रवर्ती सन्त हुए ! द्रोणाचार्यजीने एकलव्यको शिष्यरूपसे स्वीकार नहीं किया तो उसने द्रोणाचार्यकी प्रतिमा बनाकर और उनको गुरु मानकर धनुर्विद्याका अभ्यास शुरू कर दिया । परिणाममें वह अर्जुनसे भी तेज हो गया ! अतः गुरु बनानेसे ही कल्याण होगा‒यह बात है ही नहीं । अगर ऐसी बात होती तो जिन्होंने गुरु बना लिया, क्या उन सबका कल्याण हो गया ? क्या उन सबको भगवान्‌ मिल गये ? जिसके उपदेशसे, मार्गदर्शनसे हमारा कल्याण हो जाय, वही वास्तवमें हमारा गुरु है, चाहे हम उसको गुरु मानें या न मानें, चाहे वह हमें चेला माने या न माने और चाहे गुरुको हमारा पता हो या न हो । दत्तात्रेयजीने अपने चौबीस गुरुओंकी बात बतायी तो क्या किसीने आकर उनसे कहा कि तू मेरा चेला है और मैं तेरा गुरु हूँ ? गुरु ऐसा बनाना चाहिये कि गुरुको पता ही न चले कि कोई मेरा चेला है !

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒ ‘क्या गुरु बिना मुक्ति नहीं ?’ पुस्तकसे

उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंके वशमें न होना अर्थात्‌ उनका आश्रय न लेना ही मनुष्यकी वास्तविक विजय है ।
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जबतक संसार-शरीरका आश्रय सर्वथा नहीं मिट जाता, तबतक जीनेकी आशा, मरनेका भय, करनेका राग और पानेका लालच‒ ये चारों नहीं मिटते ।
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मनुष्य ही आसक्तिपूर्वक संसारसे सम्बन्ध जोड़ता है, संसार कभी सम्बन्ध नहीं जोड़ता ।                      
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संसारके साथ मिलनेसे संसारका ज्ञान नहीं होता और परमात्मासे अलग रहनेपर परमात्माका ज्ञान नहीं होता‒यह नियम है ।
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(‘अमृत-बिन्दु’ पुस्तकसे)

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