।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
श्रावण कृष्ण दशमी, वि.सं.-२०७४, बुधवार
कामदा एकादशी-व्रत (वैष्णव)
साधनकी मुख्य बाधा


साधक वह है, जिसमें असाधन अर्थात् साधन-विरुद्ध बात न हो । सांसारिक भोग तथा संग्रहका उद्देश्य और रूचि होना ही साधन-विरुद्ध बात है । साधन-विरुद्ध उद्देश्य और रूचि साथमें रहनेके कारण साधन करते हुए भी उन्नति नहीं होती । जबतक धन, मान, बड़ाई, आराम आदिका उद्देश्य और प्रियता साथमें रहती है, तबतक मनुष्य वास्तवमें साधक नहीं होता ।

कभी पारमार्थिक रूचि, कभी सांसारिक रूचि; कभी सद्गुण-सदाचार, कभी दुर्गुण-दुराचार – इस प्रकार साधनके साथ-साथ साधन-विरुद्ध बात तो प्रत्येक साधारण मनुष्यमें रहती है । किसी मनुष्यमें साधनकी मुख्यता रहती है और किसी मनुष्यमें साधन-विरुद्ध आचरणकी मुख्यता रहती है । परमात्माका अंश होनेके कारण सद्गुण-सदाचारसे सर्वथा रहित कोई मनुष्य हो ही नहीं सकता । मनुष्यमें केवल सद्गुण-सदाचार तो रह सकते हैं, पर केवल दुर्गुण-दुराचार रह ही नहीं सकते । अतः थोड़े-से सद्गुण-सदाचारसे, थोड़े-से साधनसे जो अपनेको साधक मान लेता है, वह गलती करता है । वास्तवमें जिस मनुष्यमें साधन-विरुद्ध आचरण नहीं है, भोग तथा संग्रहका उद्देश्य नहीं है, प्रत्युत एकमात्र परमात्मतत्वकी प्राप्तिका उद्देश्य है, वही साधक कहलानेयोग्य है ।

जिसका यह भाव रहता है कि ‘हम बाबाजी (साधु) थोड़े ही हैं ! हम तो गृहस्थ हैं, संसारमें रहते हैं, पैसा कमानेके लिये झूठ, कपट, बेईमानी आदि तो करने ही पड़ते हैं; क्योंकि इनके बिना पैसा पैदा होता नहीं, काम चलता नहीं’ आदि, वह साधक नहीं होता, प्रत्युत ‘संसारी’ होता है । परन्तु जिसका यह भाव रहता है कि ‘मैं तो साधक हूँ और मेरेको केवल तत्वकी प्राप्ति करनी है; अतः मैं साधन-विरुद्ध कार्य कैसे कर सकता हूँ’, वह ‘साधक’ होता है । साधकका यह भाव होता है कि जीवन-निर्वाहके लिये झूठ, कपट, बेईमानी आदि करनेकी जरूरत ही नहीं है । काम चलानेकी जिम्मेवारी ईश्वरपर है, हमारे पर नहीं । यदि अन्न-जल न मिलनेसे मर जायँगे तो क्या अन्न-जल मिलनेसे नहीं मरेंगे ? समयसे पहले कोई मर ही नहीं सकता, फिर जीवन-निर्वाहके लिये चिन्ता करने की क्या जरूरत है ?[*]

जो मनुष्य संसारी होता है, उसमें सांसारिकपना अखण्ड रहता है अर्थात् वह जिस रीतिसे सांसारिक कार्य करता है, उसी रीतिसे पारमार्थिक कार्य (साधन) भी करता है । परन्तु जो मनुष्य साधक होता है, उसमें साधकपना अखण्ड रहता है अर्थात् वह जिस रीतिसे पारमार्थिक कार्य (साधन) करता है, उसी रीतिसे सांसारिक कार्य भी करता है । सांसारिक रूचिवाला मनुष्य सांसारिक कार्य तो लिप्त (तल्लीन) होकर करता है, पर पारमार्थिक कार्य निर्लिप्त होकर (केवल नियमपूर्तिके लिये) करता है ! परन्तु पारमार्थिक रूचिवाला साधक पारमार्थिक कार्य तो लिप्त (तल्लीन) होकर करता है, पर सांसारिक कार्य निर्लिप्त होकर (कर्तव्यमात्र समझकर) करता है ।    

  (शेष आगेके ब्लॉगमें)
–‘साधन-सुधा-सिंधु’ पुस्तकसे



[*] प्रारब्ध  पहले  रचा,    पीछे   रचा  शरीर ।
  तुलसी चिन्ता क्यों करे, भज ले श्रीरघुवीर ॥

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
श्रावण कृष्ण दशमी, वि.सं.-२०७४, बुधवार
कामदा एकादशी-व्रत (स्मार्त)
वैष्णव एकादशी-व्रत कल है
साधनकी मुख्य बाधा



(गत ब्लॉगसे आगेका)
         
         इसने हमारा सम्मान नहीं किया, इसने हमारे विरुद्ध बात कर दी, इसने हमारा घाटा लगा दिया, इसने हमारे व्यापारमें बाधा लगा दी, इसने हमारी उन्नतिमें बाधा लगा दी–यह जो दूसरेको निमित्त मानना है, यह बहुत बड़ी भूल है । इस भूलसे महान् अनर्थ होता है, अपनी तरफ दृष्टि नहीं जाती, जब कि केवल अपनी तरफ दृष्टि जानी चाहिये । हमारेमें मानकी, बड़ाईकी, सुखकी इच्छा है, इस कारणसे दुःख होता है । दूसरा दुःख दे नहीं सकता । दूसरेसे दुःख तभी होता है, जब हम भीतरसे सुख चाहते हैं । अतः दुःखके कारण हम खुद ही हुए । ऐसा जिस दिन हमने समझ लिया, उस दिनसे हमारी उन्नति शुरू हो जायगी । बिलकुल पक्‍की बात है । जबतक यह दृष्टि रहेगी कि उसने ऐसा नहीं किया, उसने ऐसा नहीं किया, तबतक कभी उन्नति नहीं होगी; क्योंकि रास्ता शुरूसे ही गलत ले लिया । गलत रस्तेपर कितना ही चलो, ठेठ (सिद्धितक) कैसे पहुँचोगे ? जो यह बात कहते हैं कि मेरा क्या दोष है इसमें, मेर दोष है ही नहीं–यही मेरा दोष है । अपने दोष नहीं दीखते–यही वास्तवमें दोषोंको स्थिर रखनेवाली चीज है–‘परो ददातिती कुबुद्धिरेषा’ । मैं अनुकूल परिस्थिति बना लेता हूँ, यह वृथाभिमान है–‘अहं करोमिति वृथाभिमानः’ । यह अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति तो आती-जाती रहती है । जैसे रातके बाद दिन और दिनके बाद रात आते-जाते रहते हैं, ऐसे ही सुखके बाद दुःख और दुःखके बाद सुख आते-जाते रहते हैं । अगर हम सुखी-दुःखी होते रहेंगे तो पारमार्थिक बातसे वंचित रहेंगे । जिसको परम आनन्दकी प्राप्ति, दुःखोंकी अत्यन्त निवृत्ति कहते हैं, वह नहीं होगी । केवल सुखकी लोलुपता, सुखकी आशाका, सुखके भोगका त्याग करें तो दुःख मिट जायँगे और महान् सुख मिल जायगा ।

         आप गहरा उतरकर सोचें कि दुःख किसका नाम है ? सुखकी इच्छाका नाम ही दुःख है, और कोई दुःख है ही नहीं । दुःख नामकी कोई वस्तु नहीं है । जो सुखकी इच्छा रखता है, उसको दुःख भोगना ही पड़ेगा–‘ये ही संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते’ । सुख तो आने-जानेवाला है, पैदा होता है और समाप्त हो जाता है–‘आद्यन्तवन्तः’ (गीता ५/२२)सुख तो रहता नहीं, पर उसकी इच्छा, आशा बनी रहती है । सुखभोगके संस्कार भीतर रहते हैं । अगर सुखकी इच्छाका त्याग कर दें तो बहुत भारी लाभकी बात है । वह लाभ क्या है ?–

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥
                                                  (गीता ६/२२)

         ‘जिस लाभकी प्राप्तिके बाद फिर दूसरा कोई लाभ माननेमें ही नहीं आता और जिसमें स्थित होनेपर बड़े भारी दुःखसे भी विचलित नहीं किया जा सकता ।’ अर्थात् उस लाभमें, उस सुखमें कभी कमी आती ही नहीं, दुःखका स्पर्श होता ही नहीं । इसलिये संयोगजन्य सुखमें लोलुपता नहीं रखनी है, उसकी आशा नहीं करनी है, उसका चिन्तन नहीं करना है, उसके लिये उद्योग नहीं करना है । हाँ, जीवन-निर्वाहके लिये उद्योग करो । पर सुखभोगका उद्देश्य रखोगे तो फँस जाओगे । इसमें कोई शंका हो तो पूछो, और बात ठीक समझमें आ गयी तो आजसे ही मान लो । सावधान हो जाओ कि संयोगजन्य सुख नहीं लेंगे । कभी इस सुखसे मोहित भी हो जायँ, राजी भी हो जायँ, तो चेत करना चाहिये कि राम.....राम.....गजब हो गया ! आज तो हम इसके वशमें हो गये ! ऐसा होते ही इसकी लोलुपता छूट जायगी; क्योंकि इसमें खुदमें ताकत नहीं है, इसके नीचे बुनियाद नहीं है, जड़ नहीं है । पारमार्थिक सुखकी बुनियाद, जड़ परमात्मा है । इसलिए यह पारमार्थिक सुख कभी मिटता नहीं ।

         जितने भी सुख हैं, वे सब-के-सब आदि-अन्तवाले हैं । अतः संसारका सुख और दुःख सदैव आपके साथ नहीं रह सकता । आपके साथ सदैव परमात्मा ही रहते हैं । वे परमात्मा दीखते नहीं । न दीखनेपर भी उनको अपना मानना है और संसारको अपना नहीं मानना है ।

         जो जंगलमें रह करके, कन्द, मूल, फल खा करके अपना जीवन बितानेवाले हैं, ऐसे-ऐसे ऋषि-मुनियोंको भी विषयासक्ति बाधा पहुँचाती है । इसलिये जो सांसारिक पदार्थोसे सुख मानते हैं, सांसारिक पदार्थोंकी गरज करते हैं, वे बड़ी भारी गलती करते हैं ।

नारयण !    नारायण !!    नारायण !!!


–‘भगवत्प्राप्तिकी सुगमता’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
श्रावण कृष्ण नवमी, वि.सं.-२०७४, मंगलवार
साधनकी मुख्य बाधा



इन्द्रियों और विषयोंके सम्बन्धसे होनेवाला जो सुख है, उसकी जो आसक्ति है, यही खास बाधा है । संसारका जो सुख लेते हैं, अनुकूलतामें राजी होते हैं, यही वास्तवमें पारमार्थिक मार्गमें बाधा है । साधन करते हुए अगर साधनमें भी सुख लेते हैं, उसमें सन्तोष करते हैं, तो आगे ऊँचे चढ़नेमें बाधा लग जाती है । जैसे, रजोगुण-तमोगुण तो बाँधते ही हैं, पर सत्त्वगुण भी सुखकी आसक्तिसे बाँध देता है–‘सुखसङ्गेन बध्नाति’ (गीता १४/६) । सुखकी आसक्तिसे छूटनेसे दुःख सर्वथा मिट जाते हैं, यह बिलकुल सच्‍ची बात है, ठोस बात है । सुखकी आसक्ति न रहे तो परम आनन्दकी प्राप्ति हो जाय, सम्पूर्ण दुःखोंकी निवृत्ति हो जाय । मान-सम्मानका सुख है, भोगोंका सुख है, अनुकूलताका सुख है–यह खास बाधा है । अगर कोई शूरवीरता करके सुखकी लोलुपतामें न फँसे तो बहुत जल्दी उन्नति हो जाय । सुख-लोलुपताका सर्वथा त्याग करते ही उन्नति स्वतःसिद्ध है–‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’ (गीता १२/१२)यह बहुत सार बात है ।

         बहुत वर्षोंतक मैं व्याख्यान देता रहा । सुनाता भी रहा, सुनता भी रहा, पढ़ता भी रहा; परन्तु यह मनमें थी कि बात क्या है ? यह कहाँ अटकाव है और क्यों अटकाव है ? कई वर्ष हो गये, तब हमें यह बात मिली । इसलिये आपको यह बात बताई कि गफलतमें न रहें । सुखासक्तिका त्याग करना ही है हमें । इसके त्यागके बिना शान्ति नहीं मिलेगी । शान्तिमें भी रमण करोगे तो परमशान्ति नहीं मिलेगी । कल्याण चाहते हैं, मुक्ति चाहते हैं, तो सुख-लोलुपताका त्याग करना पड़ेगा, सुखकी आशाका त्याग करना पड़ेगा, सुखके भोगका त्याग करना पड़ेगा । बिना छोड़े शान्ति मिलेगी नहीं, बिलकुल पक्‍की, ठोस बात है ।

         भगवान्‌ने कह दिया कि ‘ये ही संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते’ (गीता ५/२२) । जितने भी सम्बन्धजन्य सुख हैं, वे दुःखोंके ही कारण हैं । इनका नाम तो सुख है, पर है महान् दुःख, जो महान् आनन्दकी प्राप्तिमें बाधा देता है, परमात्माकी प्राप्तिसे वंचित करता है । भोगोंका सुख है, मानका सुख है, बड़ाईका सुख है, शरीरके आरामका सुख है, संग्रह करनेका सुख है, मेरे पास रुपया है, विद्या है, मैं समझदार हूँ–ऐसा जो अभिमानजन्य सुख है, यह सब बाधक है । सुखका अनुभव होना, ज्ञान होना बाधक नहीं है । मेरेको सुख मिलता रहे, मैं सुखी रहूँ–यह जो भीतरमें इच्छा है, यह बाधक है । इससे बड़ा भारी अनर्थ पैदा होता है । कोई हमारे सुखमें बाधा देता है, वह हमें बुरा लगता है । इसमें एक मार्मिक बात है, सज्जनो ! दूसरा हमें बुरा लगता है–यही खास बुराई है ।

     सुखस्य दुःखस्य न कोऽपि दाता
          परो ददातिती कुबुद्धिरेषा ।
     अहं करोमीति वृथाभिमानः
             स्वकर्मसूत्रे ग्रथितो हि लोकः ॥
                                (अध्यात्मरामायण २/६/६)

         ‘सुख या दुःखको देनेवाला कोई और नहीं है । कोई दूसरा सुख-दुःख देता है–यह समझना कुबुद्धि है । मैं करता हूँ–यह वृथा अभिमान है; क्योंकि लोग अपने-अपने कर्मोंकी डोरीसे बँधे हुए हैं ।’
  (शेष आगेके ब्लॉगमें)

–‘भगवत्प्राप्तिकी सुगमता’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
श्रावण कृष्ण अष्टमी, वि.सं.-२०७४, सोमवार
सत्संगके फूल



साधन शरीरनिरपेक्ष होता है । कारण कि साधनमें स्वयंकी जरूरत है, शरीरकी नहीं । ध्येय परमात्माका होनेपर भी जड़ शरीरका सहारा लेना गलती है । समाधितक जड़ शरीरका सहारा है ! सबसे ऊँचा सहारा परमात्माका है । उद्योग तो करो, पर उद्योगका सहारा मत लो‘मामाश्रित्य यतन्ति ये’ (गीता ७/२९) । औरका सहारा न ले, केवल भगवान्‌का सहारा ले, तब काम होगा ।

एक  बानि  करुनानिधान  की ।
सो प्रिय जाकें गति न आन की ॥
                                      (मानस, अरण्य १०/४)
॰॰॰   ॰॰॰   ॰॰॰

        पारमार्थिक मार्गपर चलनेके लिये विवेककी बड़ी आवश्यकता है । गीताका आरम्भ भी विवेकसे हुआ है । जीनेकी इच्छा और मरनेका भय अविवेकीमें ही होता है, विवेकीमें नहीं । जो चिन्ता करते हैं, वे भी अविवेकी हैं ।
         ऐसा होना चाहिये, ऐसा नहीं होना चाहियेयह इच्छा कहलाती है । प्राणशक्ति नष्ट होनेपर भी इच्छाशक्ति रहती है, तभी आगे जन्म होता है । इच्छाशक्ति न रहे तो दुबारा जन्म नहीं होता ।

        मरनेवाला तो मरेगा ही और न मरनेवाला नहीं मरेगा । गंगाजीके प्रवाहको रोकना भी मूर्खता है और प्रवाहको धक्‍का देना भी मूर्खता है !
॰॰॰   ॰॰॰   ॰॰॰

        अपने-अपने कर्तव्य-कर्मोंके द्वारा भगवान्‌का पूजन करना चाहिये

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।
                                                  (गीता १८/४५)

   स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ।
                                                  (गीता १८/४६)
        परमात्माका पूजन करनेसे संसारमें सबका पूजन हो जाता है

यथा तरोर्मूलनिषेचनेन तृप्यन्ति तत्स्कन्धभुजोपशाखाः ।
प्राणोपहाराच्‍च यथेन्द्रियाणां तथैव सर्वार्हणमच्युतेज्या ॥
                                       (श्रीमद्भागवत ४/३१/१४)

         ‘जिस प्रकार वृक्षकी जड़ सींचनेसे उसके तने, शाखाएँ, उपशाखाएँ आदि सभीका पोषण हो जाता है, और जैसे भोजनद्वारा प्राणोंको तृप्त करनेसे सभी इन्द्रियाँ पुष्ट हो जाती हैं, उसी प्रकार भगवान्‌की पूजा ही सबकी पूजा है ।’

        कारण यह है कि परमात्मा सम्पूर्ण प्राणियोंके सनातन तथा अव्यय बीज हैं‘बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्’ (गीता ७/१०), ‘बीजमव्ययम्’ (गीता ९/१८)

        आत्मज्ञान न हो तो पढ़े-लिखे और अनपढ़दोनों मनुष्य समान हैं

पढ़े अपढ्ढे सारखे,   जो  आतम  नहिं लक्ख ।
शिल सादी चित्रित ‘अखा’, दो डूबण पक्ख ॥

        सभी आश्रमोंका लक्ष्य परमात्मप्राप्ति ही है । ब्रह्मचर्याश्रम सभी आश्रमोंकी नींव है । मकान दीखता है, पर नींव नहीं दीखती । अच्छे-अच्छे महात्माओंकी नींव (बालकपना) दीखती नहीं, छिपी रहती है ।


‘सत्संगके फूल’ पुस्तकसे

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